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Saturday, January 19, 2008

अनुक्रम

  कविता
कवि
1.
मेजर आदित्य त्रिपाठी
2. मेजर आदित्य त्रिपाठी
3. उमाशंकर यादव
4. डॉ० उमाशंकर शुक्ल 'उमेश'
5. डॉ० उमाशंकर शुक्ल 'उमेश'
6. ओम प्रकाश 'जयन्त'
7. ओम प्रकाश 'जयन्त'
8. डॉ ० कनक लता तिवारी 'कनु'
9. डॉ ० कनक लता तिवारी 'कनु'
10.

डॉ ० कनक लता तिवारी 'कनु'

11. डॉ० कृष्ण कुमार मिश्र
12. डॉ० कृष्ण कुमार मिश्र
13. कुमार दिनेश 'प्रियमन'
14. कुमार दिनेश 'प्रियमन'
15. डॉ० गणेश नारायण शुक्ल
16. डॉ० गणेश नारायण शुक्ल
17. जगन्नाथ वर्मा
18. जगन्नाथ वर्मा
19. जयनारायण शुक्ल 'ज्ञानेश'
20. जयनारायण शुक्ल 'ज्ञानेश'
21. दिनेश कुमार सिंह 'दिनेश उन्नावी'
22. दिनेश कुमार सिंह 'दिनेश उन्नावी'
23. पुरुषोत्तम 'मधुप'
24. पुरुषोत्तम 'मधुप'
25. पुरुषोत्तम 'मधुप'
26. भानुदत्त त्रिपाठी 'मधुरेश'
27. भानुदत्त त्रिपाठी 'मधुरेश'
28. मनोज सहगल 'जोश हिन्दुस्तानी'
29. अनिल किशोर शुक्ल 'निडर'
30. अनिल किशोर शुक्ल 'निडर'
31. अनिल किशोर शुक्ल 'निडर'
32. अनिल किशोर शुक्ल 'निडर'
33. मदन मोहन शुक्ल 'मधुर'
34. मदन मोहन शुक्ल 'मधुर'
35. मनोरमा पाण्डेय 'मनो'
36. मनोरमा पाण्डेय 'मनो'
37. मनोरमा पाण्डेय 'मनो'
38. डॉ० महेश चन्द्र मिश्र 'विधु'
39. डॉ० महेश चन्द्र मिश्र 'विधु'
40. डॉ० महेशचन्द्र शुक्ल
41. डॉ० महेशचन्द्र शुक्ल
42. नरेन्द्र बहादुर सिंह 'उम्मीद'
43. गीत नरेन्द्र बहादुर सिंह 'उम्मीद'
44. रामखेलावन वर्मा 'सरोज'
45. रामखेलावन वर्मा 'सरोज'
46. डॉ० रामप्रसाद मिश्र
47. डॉ० रामप्रसाद मिश्र
48. राम स्वरुप दुबे
49. राम स्वरुप दुबे
50. डॉ० लक्ष्मीशंकर बाजपेयी
51. डॉ० लक्ष्मीशंकर बाजपेयी
52. कु० वत्सला 'कविता'
53. कु० वत्सला 'कविता'
54. वीरेन्द्र त्रिवेदी
55. वीरेन्द्र त्रिवेदी
56. सियाराम 'शरण' अग्निहोत्री
57. सियाराम 'शरण' अग्निहोत्री
58. सुरेन्द्र पाण्डेय 'रज्जन'
59. सुरेन्द्र पाण्डेय 'रज्जन'
60. डॉ० सुर्यनारायण शुक्ल
61. डॉ० सुर्यनारायण शुक्ल
62. शिव कुमार मिश्र
63. शिव कुमार मिश्र
64. त्रिभुवन सिंह चन्देल 'स्वच्छन्द'
65. त्रिभुवन सिंह चन्देल 'स्वच्छन्द'

हम, तुम सबसे हारे हैं

हर बहना मेरी बहना हों, इससे अच्छा क्या होगा?
मेरा कहना सच कहना हों, इससे अच्छा क्या होगा?

सारे बच्चे अलग-अलग घर में नाहक ही रहते हैं-
सबका मेरे घर रहना हों, इससे अच्छा क्या होगा?

हर घर में मनकामेश्वर हों, इससे अच्छा क्या होगा?
सबके बच्चे सबसे अच्छे, इससे अच्छा क्या होगा?

सुनता हूँ उसने अपने बेटे को मेरा नाम दिया-
सब बेटे मेरे जैसे हों, इससे अच्छा क्या होगा?

सबके बाबा मोटेश्वर हों, और शंकरी दादी हों।
सबके मन कोमल हों, सबके हाथ-पाँव फौलादी हों।

अलग-अलग शहरों के फल खाने का मजा निराला है-
आम सफीपुर के हों तो अमरुद इलाहाबादी हों।

हम भगवती चरण वर्मा की जन्मभूमि के वासी हैं-
कभी अयोध्या में रहते हैं और कभी बनवासी हैं।

लोग हमें परदेशी कहकर प्रायः दुःख पहुँचाते हैं।
हमें गर्व होता है हम जनपद उन्नाव निवासी हैं।

हमें दिवाकर जगन्नाथ लल्लू पंजू सब प्यारे हैं।
जो भी हैं जितने भी हैं सबके सब मित्र हमारे हैं।

तुम सब लोग वहाँ रहते हों हम तो यहाँ अकेले हैं-
तुम सब हमसे जीत गए हो, हम तुम सबसे हारे हैं।

- मेजर आदित्य त्रिपाठी

बांसुरी की याद आई

कृष्ण ने परदेश जाकर पार्थ को गीता सुनाई,
जिन्दगी भर राधिका को बांसुरी की याद आई।

यह बहाना मत बनाओ, पथ नही है, रथ नही है,
जीतनी होगी तुम्हें तुम्हें अस्तित्व की लड़ाई।

मन सरल होगा तभी सम्बन्ध आगे तक चलेंगे,
व्यर्थ चतुराई करायेगी तुम्हारी जग हँसाई।

प्रार्थनायें जब शिखर से दूर नभ को चूम लेंगी,
तब तुम्हें वरदान की दीपावली देगी दिखाई।

तुम किसी आदर्श के पीछे भला कब तक चलोगे?
तुम स्वयं आदर्श बन जाओ इसी में है बड़ाई।

हर समय अन्याय अत्याचार से लड़ना पड़ेगा,
अन्यथा इस देश पर शासन करेंगे आतताई।

याद रखना, यह समय फिर लौट कर आना नहीं है,
इसलिये तुम सर्वदा सोचा करो सबकी भलाई।

आस्था-विश्वास का वातावरण ऐसा बनाओ,
प्यार जागे और हों जग से विषमता की विदाई।

- मेजर आदित्य त्रिपाठी

भारत-महिमा

(1)
कृष्ण के सनेह वाली मीराबाई भारत में,
सीता, सावित्री, अनुसुइया सी कहानी है।
मेरे घर लक्ष्मी हैं, दुर्गा भवानी जैसी,
तेरे यहाँ क्लिंटन की, मोनिका निशानी है॥
तू तो मदमस्त होके इतरा रहा है देख,
अब्दुल कलाम जैसा विश्व में न शानी है।
धिक्-धिक् क्लिंटन हैं मोनिका चरित्र तेरे,
भारत विवेकानन्द जागती जवानी है॥
(2)
भारती चरित्र है, पवित्रता के द्वारा पला,
गंगा की धवल धार चरण पखारती।
कश्मीर से कुमारी कन्या का स्नेह यहाँ
मातु वैष्णों की विश्व ने उतारी आरती॥
विन्ध्यवासिनी के सिंह की दहाड़ भारत में,
गौरी और काली मातु असुर संहारती।
यहीं है अमरनाथ, बद्रीनाथ धाम यहीं,
जहाँ हिमवारि शिवलिंग को संवारती॥
(3)
यहीं के है आजाद, अशफाक भगत सिंह,
शास्त्री सुभाष जैसी, भारत की शान हैं।
अब्दुल हमीद जैसे टैंक भेदी भारत में,
सत्य औ अहिंसा वाले गाँधी उपमान हैं॥
सूर जैसे शौर्यवाले चन्द्र जैसे तुलसी हैं,
श्याम के अनन्य भक्त कवि रसखान हैं।
अपने कबीर औ रहीम यहीं विद्यमान,
भारत में भूषण, निराला जैसा ज्ञान है॥
(4)
अपनी पुनीत बाल्मीकि की तपस्थली ही
भारत का आज इतिहास बतला गई।
जानकी पियारी, जानकी को त्याग राम यहीं,
लवकुश भक्ति, पितृशक्ति को झुका गई॥
वट तरु, छांह, कुण्ड, जानकी समाई मातु,
आज यह भूमि धन्य, धन्य कहला गई।
आज हूँ दरस रमणीक दिव्य दृष्यमान,
रघुकुल-रीति, जय-गान, गान गा गई॥
- उमाशंकर यादव

वे बच्चे प्यारे लगते हैं

खुली वायु में रोज टहलते,
खूब दौड़ते खूब उछलते,
आँख, दाँत, मुँह धोकर अपना-
पाठ याद करने लगते हैं।

मल-मल कर जो रोज़ नहाते,
और समय पर खाना खाते,
कपड़े साफ पहन कर अपने-
रोज़ सुबह पढ़ने चलते हैं।

शाम समय जब घर वे आते,
तरह-तरह के खेल रचाते,
लड़ना-भिड़ना छोड़, सभी से-
हिल-मिल कर जो रहते हैं।

साहस से हर काम बनाते,
आलस सुस्ती दूर भगाते,
मीठी वाणी बोल-बोलकर-
सबको दिल से खुश करते हैं।

पढ़ने में मन खूब लगाते,
कभी काम से जी न चुराते,
धन्य देश वह जहाँ कि ऐसे-
होनहार बालक पलते हैं।

- डॉ० उमाशंकर शुक्ल 'उमेश'

देखो! एक सपेरा आया

कन्धे पर टाँगे है झोली,
बोल रहा है अद्भुत बोली,
बीन बजाकर उसने सचमुच-
बच्चों के मन को बहलाया।

बच्चे उसको घेर रहें हैं,
मिल-जुल कर सब टेर रहें हैं,
बच्चों की इस शैतानी से-
सचमुच उसका दिल घबराया।

बबलू के दरवाजे आकर,
घेर लिया बच्चों ने जाकर,
बीन बजाकर उसने सहसा-
बच्चों का भी जी ललचाया।

उसने एक पिटारा खोला,
एक सांप भीतर से डोला,
फुफक पड़ा भागे सब बच्चे-
रामू का भी दिल घबराया।

नीले काले हरे रंग के,
सांप, बिच्छुएँ ढंग-ढंग के,
कुछ हाथों में कुछ कन्धे पर-
कुछ को गरदन में लपटाया।

दस-दस पैसे लगे माँगने,
बच्चे सुन-सुन लगे भागने,
दो-दो चुटकी आटे पर ही-
उसने सारा खेल दिखाया।

- डॉ० उमाशंकर शुक्ल 'उमेश'

त्याग

एक बार जापान देश में, था पड़ गया अकाल।
हुई दुर्दशा, लोग हों गए धन के बिना बेहाल॥

एक कृषक था वहाँ उस समय जिसके विमल विचार।
सदा सोचता जो परहित हित, ऐसा चतुर उदार॥

उसने किया विचार हो गयी, नष्ट सभी हैं चीज़।
फसल उगाने समय यहाँ से, सब पायेंगे बीज॥

उसके घर में रखा हुआ था, इक बोरा भर धान।
सोचा इसे बचाना इस दम है, है कर्तव्य महान॥

ठान लिया इस बोरे का अब, नही करूँ स्पर्श।
और सभी के संग भूखा रहता, मर जाने में है हर्ष॥

इस प्रकार से भूखा रहता, कुछ भी छुआ ना धान।
भूखा रहा बिना कुछ खाए, छोड़ा अपना प्रान॥

एक दिवस देखा सब ही ने, पर हित का अनुराग।
बोरे पर सिर टिका पड़ा था, कितना अद्भुत त्याग॥

- ओम प्रकाश 'जयन्त'

स्वामिभक्ति

एक बार की बात, एक
घर में घुस आया चोर!
स्वामिभक्त कुत्ता आँगन में
लगा भौकने जोर!!

कुत्ते को चुप करने की तब,
सोची उसने चाल।
टुकड़ा फेंक उसे चुप कर दूँ,
ले जाऊँ सब माल!!

चाल समझकर कुत्ता बोला,
समझ गया मैं आशय!
बन्द करूँ भौंकना और तुम,
चोरी करो महाशय!!

किन्तु नही यह पूरी होगी,
कभी तुम्हारी आस!
मूर्ख नहीं कर्तव्य छोड़ कर
दौड़ूं, खाऊं मांस!!

जाओ चले यहाँ से फौरन,
नहीं गलेगी दाल!
स्वामिभक्त हूँ, मैं स्वामी का,
देखूंगा सब माल!!

जोर-जोर भौंकने लगा फिर
भागा चोर बचाकर जान!
बच्चों! स्वामिभक्त बन तुम भी
रक्खो सबका मान!!

-ओम प्रकाश 'जयन्त'

'आरुष' का पहला कदम

पहली बार चला जब 'आरुष'
नन्हें-नन्हें कदम बढ़ाते।
माँ का मुख खिल उठा, एकदम
पापा भी देखो मुस्काते।
डगमग-डगमग करता वो तो-
दौड़ा-दौड़ा घर में फिरता।
कोशिश में चलने की देखो-
कितनी बार तो है वो गिरता!
फिर भी उठकर बढ़ने को,
हो जाता है तैयार!
प्यारे बच्चों जीवन में तुम,
कभी न मानो हार!!

- डॉ ० कनक लता तिवारी 'कनु'

मै तो चन्दा लूँगा

पानी बरसे झर-झर-झर
चिड़िया उड़ती फर-फर-फर
मिट्ठू भइया फिर भी रोते
उन्हें न अच्छा लगता घर
कैसे उन्हें मनाऊँ?
सोच रही हूँ मैं-
क्या घोडा ले आऊँ?
या फिर मोटर करती पैं-पैं-पैं
फिर भी मुँह फूला है उनका,
आती नही कोई मुस्कान।
मैं तो बस चन्दा ही लूँगा,
पकड़ के लाओ उसके कान।
- डॉ ० कनक लता तिवारी 'कनु'

मिट्ठू का तोता

मिट्ठू का एक तोता आया
घर में सबको वो मन भाया
हरी मिर्च खाता वो टुक-टुक
और खाता अमरुद
मिट्ठू उसे देख कर खुश हो
गाने गाता खूब
जब तोते का मन हो जाता
जोर-जोर से कहता राम
वरना वो तो सारे दिन ही
पिजड़ें में करता आराम।

- डॉ ० कनक लता तिवारी 'कनु'

बालगीत

याचना मेरी सुनो। कोमल है मेरा तन॥
माखन-सा मेरा मन। अर्चना मेरी सुनो॥
नन्हा-सा फूल हूँ मैं। चरणों की धुल हूँ मैं॥
वन्दना मेरी सुनो। निर्मल है उर मेरा॥
ना जानूँ तेरा-मेरा। कल्पना मेरी सुनो॥
अमिय रस घोली है। तोतली बोली है॥
कामना मेरी सुनो। मैं तेरा बिन्दु हूँ॥
तू मेरा सिन्धु है। भावना मेरी सुनो॥

- डॉ० कृष्ण कुमार मिश्र

छोटे बच्चे, मन के सच्चे

सीधे साधे तनके कच्चे।
छोटे बच्चे, मन के सच्चे॥

जननी तभी पूर्णता पाती। बच्चा जानती माँ कहलाती॥
कितने प्यारे नन्हें बच्चे। छोटे बच्चे, मन के सच्चे॥

बोल तोतली, समझ न पाते। पर वह कितना ह्रदय लुभाते॥
स्फुट बोल बोलते बच्चे। छोटे बच्चे, मन के सच्चे॥

मन्दिर-मस्जिद भेद मिटते। नहीं किसी से वह घबड़ाते॥
सबको गले लगाते बच्चे। छोटे बच्चे, मन के सच्चे॥

बच्चों के हैं सबसे नाते। कलुषित भाव समझ ना पाते॥
प्रेम-सुधा बरसाते बच्चे। छोटे बच्चे, मन के सच्चे॥

इक मीठी मुस्कान के आगे। भरी तनाव जिंदगी भागे॥
कितने सहज सरल हैं बच्चे। छोटे बच्चे, मन के सच्चे॥

- डॉ० कृष्ण कुमार मिश्र

मधुमक्खी

फूल-फूल से शहद चुराये।
आओ! मधुमक्खी बन जायें॥

मधुमक्खी का गुण-चुनना है।
मधु सा मधुर स्वप्न-बुनना है॥

जीवन की खिलती डाली पर-
गीतों का गुन-गुन गुनना है॥

हम, सौरभ को शहद बनायें।
आओ! मधुमक्खी बन जायें॥

अपनी मेहनत खून-पसीना।
अपने संकल्पों पर जीना॥

सुख-दुःख राग-द्वेष से उठकर।
अच्छाई का अमृत पीना॥

छत्तों का संसार सजायें।
आओ! मधुमक्खी बन जायें॥

- कुमार दिनेश 'प्रियमन'

बादलों की सवारी

चलो! बादलों पर सवार हों-
घूमें दुनिया सारी।
बिना किराया खर्च किये
यह अद्भुत एक सवारी॥

आसमान के नीले जंगल-
में बादल खरगोश।
भरे कुलाँचे सिर के ऊपर-
भरते हममें जोश॥

हम होते बादल से हलके
तो ऊपर उड़ जाते।
आसमान के चाँद-सितारों-
तक ऊपर चढ़ पाते॥

वहाँ पहुंचकर दादी माँ को
करते अपना फोन।
जब वे कहतीं 'हेलो! कौन तुम?'
मैं हों जाता मौन॥

हेलो! हेलो!! कर दादी माँ-
जब हों जाती हैरान।
कहता, मैं हूँ लालू, दादी!
बेटा हूँ शैतान!!

आऊँगा अब फिर सावन में
बूंद-बूंद बरसूंगा।
तुम्हें भिगो दूँगा आँगन में-
तेरी मिट्ठी लूँगा॥

- कुमार दिनेश 'प्रियमन'

पेड़ की सलाह

इक नन्हा-सा पौधा इक दिन
बडे पेड़ से बोला,
दादा! आता एक आदमी
ले लोहे का गोला।
बोला पेड़ कि नन्हें तुझ पर
रहे सदा हैयाली,
गोला नही कुल्हाड़ी है यह
पेड़ काटने वाली।
इतना सुनकर सहम गया
नन्हा पौधा घबराया
धीरे से पुचकार पेड़ ने
साहस दे समझाया
डर मत नन्हें अभी, कुल्हाड़ी
में तो वेंट नहीं है
अपनी लकड़ी-जाति से हुई
इसकी भेंट नहीं है।
जब तक घर की भेदी
कोई लकड़ी इसे न मिलती
तब तक कितनी भी पैनी हो
नहीं कुल्हाड़ी चलती।
लेकिन जिस दिन हम लोगों में
कोई एक टूटेगा
उस दिन से ही इस उपवन का
बना भाग्य फूटेगा।
जब तक हम सब पेड़ बाग़ में
इक जुट घने रहेंगे
तब तक कोई काट न सकता
हरदम बने रहेंगे।
नन्हें! रखना याद
एकता ही मजबूत धुरी है
फूट खेत में अच्छी होती
घर की फूट बुरी है।

- डॉ० गणेश नारायण शुक्ल

चन्दा मामा लड़े चुनाव

'चन्दा मामा लड़े चुनाव'
धूम मची तारों के गांव।

एक्कम को ऐलान, दूज को-
जाकर जमा किया पर्चा,
तीज नये तेवर से बोले
चौथ चली घर-घर चर्चा,
पंचम पड़ते सबके पांव,
चन्दा मामा लड़े चुनाव।

छठ को छूट नक़ल की देकर
आरक्षण के लाभ बताते
सप्तम को सप्तर्षि भवन में
मंदिर की सौगंध उठाते
अष्टम अष्ट्ग्रहों के गांव
चन्दा मामा लड़े चुनाव।

नवमी नखत-नखत के द्वारे
दशमी दौड़े हाथ पसारे
एकादशी को इक जुट होकर
वोट डालने निकले तारे
द्वादश तेरस पड़ा पड़ाव
चन्दा मामा लड़े चुनाव।

चतुर्दशी को हुई घोषणा
चन्दा मामा हार गये
निकले नही अमावस को फिर
चुपके छुपे फरार हुए,
अन्तरिक्ष में बढ़ा तनाव
चन्दा मामा लड़े चुनाव।

घटने बढ़े झूठ बोलने
से ही चन्दा हारा है
रह कर हरदम अटल बात पर
जीत गया ध्रुवतारा है
सबसे अच्छा सत्य सुझाव
चन्दा मामा लड़े चुनाव।

- डॉ० गणेश नारायण शुक्ल

Friday, January 18, 2008

राजा बेटा

अच्छे बच्चे प्रातः उठते
माता-पिता के दर्शन करते।

नित्य क्रिया पर कुल्ली करते,
ठीक समय पर पढ़ने जाते।

गुरुजन का वे आदर करते,
कक्षा में हिल-मिलकर रहते।

हर पल अच्छी बातें करतें,
दोस्तों में वे साहस भरते।

अपना पाठ समय पर पढ़ते,
राजा बेटा चोटी चढ़ते।

- जगन्नाथ वर्मा

सच्चे बच्चे

गाँधी को आदर्श मानकर,
सत्य-अहिंसा पर वे चलते।
सच को जिसने गले लगाया,
उसने निज जीवन महकाया।

भूदानी राधोवा प्यारे,
और बिनोवा भावे प्यारे।
सुभाषचन्द्र के तेवर प्यारे,
शास्त्री जी के न्यारे प्यारे।

जे० पी० को आदर्श मानकर,
राष्ट्र प्रेम पर वे हैं चलते।
कहलाते तब सच्चे बच्चे।
अच्छे बच्चे, सच्चे बच्चे॥

- जगन्नाथ वर्मा

चूहे की बरात

चूहे की जा रही बरात!
बन्दर मामा भी हैं साथ!!
हाथी चलता आगे आगे!
घोड़ा सर-सर-सर-सर भागे!!

ऊँट चल रहा लंबी चाल!
भालू राजा करें कमाल!!
श्वान बजाये भों-भों बाजा!
नाच रहें हैं भालू राजा!!

पहन लिया कुर्ता पैजामा!
लगे नाचने बन्दर मामा!!
जुगुनू चमचम करे प्रकाश!
हुआ खूब हास-परिहास!!

तब तक हो गई आधी रात!
पहुँच गई द्वारे बरात!!
खूब सजा चुहिया का द्वार!
हुआ बहुत स्वागत सत्कार!!

चुहिया ने डाला जयमाल!
बजीं ताडियाँ गूँजा हाल!!
तब बोली चूहे की दादी!
किया दहेज़ बिना यह शादी!!

- जयनारायण शुक्ल 'ज्ञानेश'