Wednesday, January 16, 2008

भारत के बच्चे

हम भारत के बच्चे हैं,
सीधे-सादे सच्चे हैं!
अपनी धुन के पक्के हैं,
कर्मशील गुन छक्के हैं!!

कोई आँख दिखाये ना,
अपना सिर खुजलाये ना!
परमवीर हम बच्चे हैं,
सीधे-सादे सच्चे हैं!!

भेद-भाव की बात नहीं,
कोई कहीं भी घात नहीं!
मेलजोल की दुनिया है,
और हमें कुछ ज्ञात नहीं!!

स्वप्न सुहाने धरती के,
हम भारत के बच्चे हैं!
सबके मन को भाते हैं,
ईश्वर के गुण गाते हैं!!

अमर शहीदों की थाती के,
गीत अनूठे गाते हैं!
सत्य-अहिंसा-प्रेम लिए उर,
स्वाभिमान के सच्चे हैं!!

हम भारत के बच्चे हैं,
सीधे-सादे सच्चे हैं!
पापा जी बोले उस दिन-
हम तो धागा कच्चे हैं!!

- कु० वत्सला 'कविता'

मेरा भइया बनें महान!

मेरा भइया बड़ा है अच्छा,
बड़ा है प्यारा, मेरा भइया!
सबको अच्छा लगता है,
नन्हा-मुन्ना मेरा भइया॥

जन्मदिवस जब आता है,
नया वर्ष ले आता है!
'बाबा' की गोदी में बैठा,
गुन-गुन कर कुछ गाता है।।

सपन संजोये नए-नए,
हँसता और हँसाता है!
मम्मी-पापा-ताऊ संग,
चाचा को अति भाता है।।

मेरा भइया आया है,
केक, गुलगुला लाया है!
टाफी, बिस्कुट और चाकलेट
का फोटो खिंचवाया है॥

बुआ और दादी को प्यारा,
ताई की आंखों का तारा!
नाना-नानी कहें कहानी,
मेरा भइया है ध्रुवतारा॥

पढ़लिखकर विद्वान बने,
सबका ऊँचा मान करें!
सच बोले खेले-कूदे,
अच्छों का सम्मान करें॥

सबके मन को भाता है,
मन का सच्चा नाता है!
'अर्पित' भइया बने महान,
कविता-मन यह गाता है॥

- कु० वत्सला 'कविता'

माँ! ध्रुवतारा क्या होता है?

बेटा! नीलगगन के घर में,
रहता जो सुदूर उत्तर में,
झिलमिल-झिलमिल होता रहता,
किन्तु न अपने पथ से डिगता,
अगणित तारों में अलबेला,
आलोकित है जिसका मेला,
सबसे जो न्यारा होता है,
वह ही ध्रुवतारा होता है।

बेटा! ध्रुव की पढ़ो जीवनी,
त्याग, तपस्या, धैर्य से सनी,
दृढ संकल्पों की राहों पर,
मंजिल को पाने को तत्पर-
रहता जिसका उत्साही-मन,
धन्य हुआ है उसका जीवन,
सारे जग को जो भाता है,
वह ध्रुवतारा हों जाता है।
- वीरेन्द्र त्रिवेदी

Tuesday, January 15, 2008

चलते जाना है

चाहे जितना पथ दुर्गम हो,
चाहे झंझावात चरम हो,
हमको तो चलते जाना है।

अनुशासन के तटबंधो में-
चंचल नदी बहा करती है,
पत्थर से टकराती, कलकल-
करती, कभी ढहा करती है,
वैसे ही जीवन-धारा में,
हमको तो बहते जाना है।

आसमान के घर में देखो
सूरज, चंद, सितारे रहते,
अपनी क्षमताओं के दर्पण-
में उनके प्रतिबिम्ब चमकते,
हमको अपने घर-आँगन में
ये दीपक धरते जाना है।

नई तरंगों में खिल जाना
नन्हें पौधों की परिणति है,
फलना जिसका जीवन-दर्शन
परहित जिसकी नीति-नियति है
वैसे ही जीवन बगिया में
खिल-खिलकर फलते जाना है।

- वीरेन्द्र त्रिवेदी

मेरी गुड़िया

मम्मी! मेरी गुड़िया है।
देखो! कितनी बढ़िया है॥
चाभी भर दो चलती है।
चींचीं - चींचीँ करती है॥
मेरा मन भी हरती है।
साँझ सकारे हंसती है॥
यह कागज़ की पुडिया है। मम्मी! मेरी... ॥

रंग-बिरंगी फागुन हो।
या वर्षा में सावन हो॥
महका-महका मधुवन हो।
या वासन्ती उपवन हो॥
फिर भी कितनी सुखिया है। मम्मी! मेरी... ॥

कभी विहँसकर ब्याह रचाती।
सबके सोने पर सो जाती॥
घर-आँगन में आती जाती।
खेल-खेल में हमें बुलाती॥
कितनी सुन्दर मनबसिया है। मम्मी! मेरी... ॥

घाट-घाट का पानी पीती।
सबको देखे है वह जीती॥
धूप-छाँव में है वह जाती।
दूध-भात नित ही है खाती॥
ऐसी यह सुख-निंदिया है। मम्मी! मेरी... ।।

कभी झूलती झूले में।
कभी मल्हारें गाती है॥
कभी झूमती गीतों में।
कजरी सावन गाती है॥
यह माथे की बिंदिया है। मम्मी! मेरी... ॥

- सियाराम 'शरण' अग्निहोत्री

Monday, January 14, 2008

आई रेल

आई रेल आई रेल।
पैसेंजर हो या हो मेल॥

झक-झक करती गाड़ी आई।
शुभ संदेशा मनो लाई।।
देखो कितनी है सुखदाई।
रेल सभी के मन को भाई॥
कोयला पानी का है खेल। आई रेल... ।।

चलते-चलते सीटी देती।
सबको चौकन्ना कर देती।।
नभ में धुवां-धुवां भर देती।
पल में मथुरा-काशी सेती॥
टिकट पैसेन्जर हो या मेल। आई रेल... ॥

रात-रात यह भी जागती है।
नर-नारी का मन हरती है॥
स्टेशन पर ही रूकती है।
कभी नही यह थकती है॥
इसमे देश-विदेशी मेल। आई रेल... ॥

रेल सदा पटरी पर चलती।
सुख-दुःख, जाड़ा-गर्मी सहती॥
जाने क्या जग से है कहती।
फप-फप कर आगे ही बढ़ती॥
गाड़ी जाती सब कुछ झेल। आई रेल... ॥

- सियाराम 'शरण' अग्निहोत्री

कस्बे में मेरे कुछ बन्दर

कस्बे में मेरे कुछ बन्दर, आ जाते थाने के अन्दर।
यहाँ सुरक्षित रह फल खाते, चौबीस घंटे मौज मनाते।
पेड़ों पर रहते हैं बैठे, कभी-कभी वे दाल हिलाते॥
हर आने-जाने वाले की, सभी कोण से थाह लगाते।
आगन्तुक अपराधी हों यदि, घुड़की देकर उसे डराते॥
समझ लिया करते पहले से, कौन लिए आता है खंजर।
कस्बे में मेरे कुछ बन्दर अन्जाने थाने के अन्दर॥

निकट वहीं तहसील भवन है, कूद-फंड कर जम्प दिखाते।
बेघर, बेबस, मुफ्लसी आते, इन्हें देख कर बहुत लजाते॥
कुछ किसान भगवान् यहाँ पर, चना-चबेना तक लुटवाते।
घुड़की भी मजबूर कराती, हाथों से कागज छिन्वाते॥
थाह लगा लेते पहले से, क्या रक्खा झोले के अन्दर।
कस्बे में मेरे कुछ बन्दर आ जाते थाने के अन्दर॥

अस्पताल भी यहीं पास है, रातें प्रायः वहीं बिताते।
पानी पीकर काम चलाते, किन्तु नही वे दवा चुराते॥
स्वतः मरीजों से जो मिलता आसानी से उसे पचाते।
छेड़छाड़ करके नर्सों से, शायद अपना दिल बहलाते॥
स्वस्थ रहे तब तक जीवन सुख, अस्थि-माँस का मानव पंजर।
कस्बे में मेरे कुछ बन्दर, आ जाते थाने के अन्दर।।

निकट शंकरी मंदिर भी है, जहाँ नही ये बन्दर जाते।
हीनभाव से ग्रस्त कदाचित, पूजन से रहते कतराते।।
पुनर्जन्म पाकर यह आये, पैसा-पैसा रहे चुराते।
जैसी जिसकी वृत्ति रही है, कृत्य आज भी वे दुहराते॥
अरे पुजारी और प्रबन्धक, मरने बाद सोच लो मंजर।
कस्बे में मेरे कुछ बन्दर, आ जाते थाने के अन्दर॥


- सुरेन्द्र पाण्डेय 'रज्जन'