मौसम एक दम बदल गया
कल थी गर्मी
आज जाड़ा हो गया !
यह पहाड़ का मौसम है
जिसका कोई भरोसा नही ...
आदमी का क्या कहूँ ?
अच्छे, भले-बुरे सभी हैं
मौका जब मिलता है
मौसम की तरह ही बदल जाते हैं
देखता हूँ
दायरा .....
दूर तक पहाडों से घिरा
ऊँचे-ऊँचे गगन चुम्बी शिखरों से घिरा
कहीं - कहीं बीच में, किनारे
कोई मैदान का टुकड़ा
बेचारा, छुटपुट आबादी वाला गाँव
नगर, जनपद.....सबके सब टंगे हैं !
कोई नीचे, कोई ऊपर.....
और कितने तो बीच में त्रिशंकु-से लटके
दिखते हैं.....जीवन है सभी कहीं
पीडा भरी नारियाँ
गहरी घाटियाँ !
जिनकी दुनिया में कहीं पहाडों का अन्त नही .....
जंगलों से जिन्हें छुटकारा नही
घास, लकड़ी और जीवन का बोझ .....
बस, इतना ही उनका जीवन .....
सपने, झरने, स्त्रोत या पत्थर के टुकड़े
गंदे, फटे-पुराने कपडों में लिपटा यौवन .....
मटमैले बाल
श्रम में डूबे तन-मन
और घुमड़ते घन ..... यही जीवन वृत्त
निजी भाषा
रोज की बातें
छान से जंगल
जंगल से कुठार और डेरा तक .....
सुबह-शाम पनघट पर...
नारी-जीवन यहाँ एक जीवन्त महाकाव्य !
बहुत कम जिसे पढ़ते हैं,
बहुत कम जिसे लिखते हैं।
और पुरुष.....
गप्पी..... श्रम से कतराता है !
कभी गंगा-जल लेकर कलकत्ता तक जाता है
बेचकर धन कमाता है
और कहीं होटल में नौकरी कर
छोटी-मोटी दुकान धर
बाबू भैया बना बस.....
शक्ति-श्रम नारी तक सीमित
वह खोखला है
कुछ पढे-लिखे लोग
कवि, चित्रकार, पत्रकार या और बुद्धिजीवी लोग
जो अपने गाँव छोड़ चुके हैं
जहाँ जाना उनके लिए पाप है
वे चकाचौंध में मंडराते हैं .....
खोखली अस्तित्वहीन मर्यादा की
सर्जना में रत हैं।
लेकिन उनकी माँ, बहन, बहू और बेटी
बूढी दादी और बूढी ताई
उन बीहड़ जंगलों में भटक रही हैं
पहाड़ से अपने भाग्य की
होनी, अनहोनी मूक वार्ता कर रही है
मिटटी के ढेले
पत्थर के टीले
तोड़ रही है
लक्ष्मी, सरस्वती, दुर्गा, भगवती को
मैंने कितनी ही बार खेतों में ढेले फोड़ते देखा हैं
बड़े-बड़े लकड़ी के बोझ
और पटालो का बोझ
उनकी सुकोमल पीठ पर
लदे देखा है;
श्रम का जीवन, नारी
आदिकाव्य की कथावस्तु
अनन्त रहेगी.....?
ऐसा सोचता हूँ !
भाग्य की विडम्बना
पहाडी लड़की
वह तो गाँव में रहती है।
मैं कवि हूँ, कविता भर लिख पाता हूँ
उनका बोझ अगर कुछ बटा लूँ
तो ठीक भी है !
बस, मन ही मन घुट गया हूँ
आंसू चुपचाप पी गया हूँ
'यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते' का पाठकर सो गया हूँ
आज सपनो में यही सब कुछ देखूंगा .....
देसी-पहाड़ी की कलुषित भावनाओं की न
सूरतों में लुटूंगा.....
किससे क्या कहूँ ?
'वसुधैव कुटुम्बकम' ..... क्या झूठ हैं?
मैं 'तुम' नही हूँ
तुम 'मैं' नही हूँ
परिस्थितियों का अनुचित लाभ मत उठाओ.....
आज की रात सो लेने दो
कल की रात तो चिन्तन में बीतेगी
पढे-लिखों की इमानदारी जीतेगी
या हारेगी.....?
मेरी माँ जो कहती हैं -
तुम चुप रहो !!
Tuesday, November 6, 2007
कवि, तुम ऐसे ही बढ़ो !
मुझे बेहद प्यार है अपने देश से,
देश की जनता से,
उसके रहनुमाओं और ... और सबसे
जितना तुम्हे...
क्योंकि हमारा देश आदर्श रहा है
चरित्रबल, आत्मबल की आधारशिला
दृढ रही है !
आध्यात्मिकता का पावन स्त्रोत जो रहा है !
किन्तु आज.....?
अब नही.....
जिधर देखता हूँ
उधर अभाव, दुःख, घृणा, कागजी फसल,
आंकड़े-प्रगति.....
चेहरे पोपले
और मनुष्यता ठीक पतझड़ में हरी
लता सी जर्जर टिकी है.....
किन्हीं ठूंठ रूखे बूढे रुख के सहारे.....
आज़ादी मिली है
पर कैद है वह तिजोरियों में
चाटुकारिता, भाई-भतीजेवाद और.....
बस मत पूछो?
पाता हूँ, भ्रष्टाचार घोर...घोर...घोर
हर कहीं, हर क्षण, हर दिशा की ओर
हर प्रहर.........सोचता हूँ
और होता हूँ बोर...बोर...बोर!!
जब सभी नैतिक, आदर्श, एवं कर्मठ,
त्यागी, संयमी
साधू, शील-सौरभ-सने चेहरे हैं?
तो फिर क्यों?
भ्रष्टाचार?
क्यों भूख?
क्यों प्यास?
क्यों अराजकता?
क्यों असन्तोष?
क्यों दुःख-द्वंद?
और यह भारी समस्या...???
जब, सभी दूध-धुले चेहरे हैं
तो आख़िर कौन हैं?
जो यह सब करता है!!
तो वासन्ती-पवन ने
फूलती हुई सरसों के खेतों से
सामने की पहाड़ी की ओर से झाँककर
इशारा किया है...
देखो...
वाहवाही का खोल
आत्म-प्रशंसा की भूख
घाटी का कुहरा
अपनी कोख में छिपाये नदी
पर हावी है !!
घाटी में बहने वाली नदी
चुपचाप .......... चट्टानों से, जूझ-जूझकर
बह रही है
और कह रही है.....
कवि, तुम ऐसे ही बढ़ो!!
देश की जनता से,
उसके रहनुमाओं और ... और सबसे
जितना तुम्हे...
क्योंकि हमारा देश आदर्श रहा है
चरित्रबल, आत्मबल की आधारशिला
दृढ रही है !
आध्यात्मिकता का पावन स्त्रोत जो रहा है !
किन्तु आज.....?
अब नही.....
जिधर देखता हूँ
उधर अभाव, दुःख, घृणा, कागजी फसल,
आंकड़े-प्रगति.....
चेहरे पोपले
और मनुष्यता ठीक पतझड़ में हरी
लता सी जर्जर टिकी है.....
किन्हीं ठूंठ रूखे बूढे रुख के सहारे.....
आज़ादी मिली है
पर कैद है वह तिजोरियों में
चाटुकारिता, भाई-भतीजेवाद और.....
बस मत पूछो?
पाता हूँ, भ्रष्टाचार घोर...घोर...घोर
हर कहीं, हर क्षण, हर दिशा की ओर
हर प्रहर.........सोचता हूँ
और होता हूँ बोर...बोर...बोर!!
जब सभी नैतिक, आदर्श, एवं कर्मठ,
त्यागी, संयमी
साधू, शील-सौरभ-सने चेहरे हैं?
तो फिर क्यों?
भ्रष्टाचार?
क्यों भूख?
क्यों प्यास?
क्यों अराजकता?
क्यों असन्तोष?
क्यों दुःख-द्वंद?
और यह भारी समस्या...???
जब, सभी दूध-धुले चेहरे हैं
तो आख़िर कौन हैं?
जो यह सब करता है!!
तो वासन्ती-पवन ने
फूलती हुई सरसों के खेतों से
सामने की पहाड़ी की ओर से झाँककर
इशारा किया है...
देखो...
वाहवाही का खोल
आत्म-प्रशंसा की भूख
घाटी का कुहरा
अपनी कोख में छिपाये नदी
पर हावी है !!
घाटी में बहने वाली नदी
चुपचाप .......... चट्टानों से, जूझ-जूझकर
बह रही है
और कह रही है.....
कवि, तुम ऐसे ही बढ़ो!!
Thursday, November 1, 2007
फिर से वही मंज़र ...!!!
"पैऱों के ज़ख़्म मंज़िल पे.. पहुँच के ग़िन लेंग़ें,
क़ि रुक -रुक के संभलने की, हमें आदत ज़रा कम है.'
'लगता है ख़ुश्बुओं से.. कोई हादसा हुआ है,
गुलशऩ में तितलियों की.. शरारत ज़रा कम है. '
'फिर से वही मंज़र है.. निगाहों से रू-ब-रू अब,
पिंज़ऱों से परिंदों की.. ज़माऩत ज़रा कम है.'
'बेफ़िक्र सी आवाऱगी.. है अब भी साथ !! लेकिन,
मुझे अब ज़माने से.. शिकायत ज़रा कम है.'
'उनसे हमारी गुफ़्तगू का.. फ़ायदा है क्या अब??
कि हम पे उनकी नज़र-ए-इनायत ज़रा कम है.'
'बचपन है गुमशुदा.. ये किताबों की सरज़मीं है,
बच्चों को मचलने की.. इज़ाज़त ज़रा कम है.'
'झूठी सी ये अफ़वाह भी.. तोड़ेग़ी नशेमन को,
कि लोगों में ना लड़ने की, शराफ़ात ज़रा कम है.'
'अंदाज़ मेरे लिखने का.. अब भी वही है !! पर,
ग़ज़लों में कहकहों की, रवायत ज़रा कम है.'
'दुश्मन की दोस्ती से.. ना कुछ फ़र्क़ अभी 'शायर',
बात ये कि दोस्तों से.. अदावत ज़रा कम है...!!!"
क़ि रुक -रुक के संभलने की, हमें आदत ज़रा कम है.'
'लगता है ख़ुश्बुओं से.. कोई हादसा हुआ है,
गुलशऩ में तितलियों की.. शरारत ज़रा कम है. '
'फिर से वही मंज़र है.. निगाहों से रू-ब-रू अब,
पिंज़ऱों से परिंदों की.. ज़माऩत ज़रा कम है.'
'बेफ़िक्र सी आवाऱगी.. है अब भी साथ !! लेकिन,
मुझे अब ज़माने से.. शिकायत ज़रा कम है.'
'उनसे हमारी गुफ़्तगू का.. फ़ायदा है क्या अब??
कि हम पे उनकी नज़र-ए-इनायत ज़रा कम है.'
'बचपन है गुमशुदा.. ये किताबों की सरज़मीं है,
बच्चों को मचलने की.. इज़ाज़त ज़रा कम है.'
'झूठी सी ये अफ़वाह भी.. तोड़ेग़ी नशेमन को,
कि लोगों में ना लड़ने की, शराफ़ात ज़रा कम है.'
'अंदाज़ मेरे लिखने का.. अब भी वही है !! पर,
ग़ज़लों में कहकहों की, रवायत ज़रा कम है.'
'दुश्मन की दोस्ती से.. ना कुछ फ़र्क़ अभी 'शायर',
बात ये कि दोस्तों से.. अदावत ज़रा कम है...!!!"
जो दुनिया के इल्ज़ाम आने थे आये,
बहुत गम के मारो ने पहलू बचाये !
न दुनिया ने थामा न तूने सम्भाला,
कहाँ आके मेरे कदम डगमगाये !
किसी ने तुम्हे आज क्या कह दिया है,
नज़र आ रहे हो पराये-पराये !
मुलाकात की कौन सी है यह सूरत,
न हम मुस्कुराये न तुम मुस्कुराये !
उलझते है हर राह् पे अब तो काँटे,
कहाँ तक कोई अपना दामन बचाये !!!
बहुत गम के मारो ने पहलू बचाये !
न दुनिया ने थामा न तूने सम्भाला,
कहाँ आके मेरे कदम डगमगाये !
किसी ने तुम्हे आज क्या कह दिया है,
नज़र आ रहे हो पराये-पराये !
मुलाकात की कौन सी है यह सूरत,
न हम मुस्कुराये न तुम मुस्कुराये !
उलझते है हर राह् पे अब तो काँटे,
कहाँ तक कोई अपना दामन बचाये !!!
कहाँ गये वो दोस्त, जो हरदम याद किया करते थे...,
जान - बुझकर न सही, मगर भूले से भी मेल किया करते थे...,
खुशी और गम में हमारा साथ दिया करते थे...,
लगता है सब खो गया है ... प्रोजेक्ट्स की डेड्लाइन्स में...,
न अपनी न हमारी, जाने किसकी यादों में...,
ज़िन्दगी को भुला चुके हैं, नौकरी की आड में...,
हरदम फ़ँसे रहते है, अपने पी.एम. के जाल में...,
कभी आओ मिलो हमसे, बैठकर बाते करो...,
दर्द - ए- दिल अपना कहो, हाले - ए - दिल हमारा सुनो...,
क्या रंजिश, क्या है शिकवा, क्या गिला और क्या खता... ;
हम भी जाने तुम भी जानो, आखिर क्या मंज़र क्या माजरा...,
बस भी करो अब...
कह भी दो, अपने दिल का हाल,
क्या करोगे खामोश रहकर
जो चली गई ये ज़िन्दगी, चला गया ये कारवां...;
जागो प्यारे...! अब बस भी करो,
सिर्फ़ काम नही, थोडा ज़िन्दगी को भी महसूस करो...,
खाओ, पिओ, हँसो, गाओ, झूमों, नाचो, मौज करो...,
हकीकत में ना भले पर कम - से - कम ...
.. भूल से ही सही हमें याद तो करो...
हम तो हरदम देंगे यही दुआ आपको..
याद न भी करो तो क्या, चलो, एन्जॉय ...............................
जान - बुझकर न सही, मगर भूले से भी मेल किया करते थे...,
खुशी और गम में हमारा साथ दिया करते थे...,
लगता है सब खो गया है ... प्रोजेक्ट्स की डेड्लाइन्स में...,
न अपनी न हमारी, जाने किसकी यादों में...,
ज़िन्दगी को भुला चुके हैं, नौकरी की आड में...,
हरदम फ़ँसे रहते है, अपने पी.एम. के जाल में...,
कभी आओ मिलो हमसे, बैठकर बाते करो...,
दर्द - ए- दिल अपना कहो, हाले - ए - दिल हमारा सुनो...,
क्या रंजिश, क्या है शिकवा, क्या गिला और क्या खता... ;
हम भी जाने तुम भी जानो, आखिर क्या मंज़र क्या माजरा...,
बस भी करो अब...
कह भी दो, अपने दिल का हाल,
क्या करोगे खामोश रहकर
जो चली गई ये ज़िन्दगी, चला गया ये कारवां...;
जागो प्यारे...! अब बस भी करो,
सिर्फ़ काम नही, थोडा ज़िन्दगी को भी महसूस करो...,
खाओ, पिओ, हँसो, गाओ, झूमों, नाचो, मौज करो...,
हकीकत में ना भले पर कम - से - कम ...
.. भूल से ही सही हमें याद तो करो...
हम तो हरदम देंगे यही दुआ आपको..
याद न भी करो तो क्या, चलो, एन्जॉय ...............................
कौन सुलगते आँसू रोके, आग के टुकडे कौन चबाये,
ओ हमको समझाने वाले कोई तुझे क्योंकर समझाये !
जीवन के अँधियारे पथ पर जिसने तेरा साथ दिया था,
देख कही वह कोमल आशा आँसू बन कर टूट न जाये !
इस दुनिया के रहने वाले अपना अपना गम खाते है,
कौन पराया रोग खरीदे कौन पराया दुःख अपनाये !
हाय मेरी मायूस उम्मीदे ! हाय मेरे नाकाम इरादे,
मरने की तदबीर न सूझी जीने के अन्दाज़ न आये !!!
ओ हमको समझाने वाले कोई तुझे क्योंकर समझाये !
जीवन के अँधियारे पथ पर जिसने तेरा साथ दिया था,
देख कही वह कोमल आशा आँसू बन कर टूट न जाये !
इस दुनिया के रहने वाले अपना अपना गम खाते है,
कौन पराया रोग खरीदे कौन पराया दुःख अपनाये !
हाय मेरी मायूस उम्मीदे ! हाय मेरे नाकाम इरादे,
मरने की तदबीर न सूझी जीने के अन्दाज़ न आये !!!
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