Monday, April 16, 2007

भीड़्भाड़ में

परसो गया देखने पाण्डव नृत्य
साथ में छोटा मुन्नू
जिसने दी प्रेरणा
चलो जी, देखें पाण्डव-नृत्य
चला मैं गया साथ में चादर ओढ़े
चप्पल पहने
उसके घर के पास
बडे आंगन में 'पक्का द्वार'
जिसे ही कहते 'पाण्डव द्वार'
यहाँ पाण्डव कि स्मृति शेष
पुण्य लीला होती है
बूढ़े - बच्चे और जवान सभी आते है
हंसी - ख़ुशी से ।
आग जलाकर बैठे चारो और, तापते
गीत गा रहे
पाँव थिरकते
मस्त झूमती ठुमुक - ठुमुक
अंगडाई लेटी हुई जवान युगुल-तन-छवियाँ
बजे ढोल पर ढोल
मधुर से बोल
नृत्य भरपूर
नशा यौवन पर छाये
जो भी आये
नाचे-गाये
बजे सीटियाँ, जोश जगाएं .....
मन को भाये ।
भीड़्भाड़ में चला गया मैं
तब तक एक सुनार
सामने मेरे आया
पीकर ख़ूब शराब
ज़माने रॉब, समझ में आये नेता ....?
बदबू .....!
मुझ पर कर बैठी आक्रमण
और मैं उल्टे पांवों
अपनी स्मृति में आ पहुँचा

पहुंच गया बेचारा मुन्नू .....
मैं बिल्कुल चुपचाप
सोचता रहा .....
पाण्डव नृत्य ..... शराब ..... धर्म की कैसी लीला ?
यह ढकोसला
और व्यर्थ की पोंगा - पंथी
सडी गली सी परम्परा का ढोल बज रहा .....
अर्जुन कब शराब पीते थे?
फिर कैसा अनुकरण .....!
मनोरंजन सस्ता है
समझ गया परिवेश .....
नही कोई रस्ता है !!

मैं गाता हूँ !

मुझे नौकरी मिली
भर गया पेट
मगर मन दुःखी
दोस्त, दुर्भाग्य
धधकता अंतर्मन है
जीर्ण दायरा, भ्रष्ट दायरे
साथ भटकता दंभ
प्रमादी आवारा शैतान शराबी
राह संकुचित
घृणित मगर क्या करूं ?
अकेला चना
भाड़ में भुन जाता है
और चिटक कर किसी आंख को वेध
जलन, बस दे देता है
पिस जाता है विवश मौन, क्या करे ?
बडे बडे चट्टान
आदमी पिस जाता है
धूर्त धूर्त का मेल
सत्य अकुला जाता है
अरे क्या कहूँ ?
कुत्सित भाव-विभाव लगाए लेबिल
शुद्ध भाव संचारी
मन का ताप दिनों-दिन प्यारे बढ़ता जाता
सब पीकर विद्रोह
मौन, बस मौन रहा है
खीसें बाए
कितने ही रौबीले झूठे मन मुरझाये ....
मैं गाता हूँ ।

बढ़ो नव सृजन !

जहाँ कहीं भी मिलें
सीखने को कुछ बातें
फौरन सीखो
कभी किसी की कमी
और अवगुण मत देखो
हमें नही उनसे मतलब है
जो जैसा है, स्वयं भरेगा
हमको तो अपने में भरना

सत-शिव-सुंदर
जहाँ कही भी मिले ढून्ढकर हंसी ख़ुशी से
धीरज-धरकर ।
काले दिन भी काटो
उजली रातें बाटों
संयम भरो, कर्म अवतारो

सही सरल-साहसमय-चिन्तन
दृढ़ता उर से भरो
बढ़ी नव सृजन !

सौम्य सुख-शान्ति दुआरे
हेर रहा है
टेर रहा है नवयुग का निर्माण
सपूतों ! सदगुन जितने भी, अपना सकते, अपनाओ

और सत्य के नव प्रयोग की
सज़ा आरती

मंगल कलश
मनुजता का
स्थापित कर दो !!

Friday, April 13, 2007

हर कदम पर इम्तिहान लेती है जिन्दगी,
हर वक़्त नए सदमे देती है जिन्दगी,
हम जिन्दगी से शिकवा करे भी तो कैसे,
आप सा दोस्त भी तो देती है जिन्दगी।
हर शाम के बाद रात आती है,
हर बात के बाद आपकी याद आती है,
खामोश रहकर भी देख लिया हमने,
क्यूंकि खामोशियों से भी आपकी आवाज़ आती है।

ग़ज़ल

एक ऐसी भी घड़ी आती है
जिस्म से रूह बिछुड़ जाती है
अब यहाँ कैसे रोशनी होती

ना कोई दीया, ना बाती है
हो लिखी जिनके मुकद्दर में खिजां
कोई रितु उन्हें ना भाती है
ना कोई रूत ना भाये है मौसम
चांदनी रात दिल दुखाती है
एक अर्से से खुद में खोए हो
याद किसकी तुम्हें सताती है

न देने वाला मन

एक भिखारी सुबह-सुबह भीख मांगने निकला। चलते समय उसने अपनी झोली में जौ के मुट्ठी भर दाने डाल लिए। टोटके या अंधविश्वास के कारण भिक्षाटन के लिए निकलते समय भिखारी अपनी झोली खाली नहीं रखते। थैली देख कर दूसरों को लगता है कि इसे पहले से किसी ने दे रखा है। पूर्णिमा का दिन था, भिखारी सोच रहा था कि आज ईश्वर की कृपा होगी तो मेरी यह झोली शाम से पहले ही भर जाएगी।
अचानक सामने से राजपथ पर उसी देश के राजा की सवारी आती दिखाई दी। भिखारी खुश हो गया। उसने सोचा, राजा के दर्शन और उनसे मिलने वाले दान से सारे दरिद्र दूर हो जाएंगे, जीवन संवर जाएगा। जैसे-जैसे राजा की सवारी निकट आती गई, भिखारी की कल्पना और उत्तेजना भी बढ़ती गई। जैसे ही राजा का रथ भिखारी के निकट आया, राजा ने अपना रथ रुकवाया, उतर कर उसके निकट पहुंचे। भिखारी की तो मानो सांसें ही रुकने लगीं। लेकिन राजा ने उसे कुछ देने के बदले उलटे अपनी बहुमूल्य चादर उसके सामने फैला दी और भीख की याचना करने लगे। भिखारी को समझ नहीं आ रहा था कि क्या करे। अभी वह सोच ही रहा था कि राजा ने पुन: याचना की। भिखारी ने अपनी झोली में हाथ डाला, मगर हमेशा दूसरों से लेने वाला मन देने को राजी नहीं हो रहा था। जैसे-तैसे कर उसने दो दाने जौ के निकाले और उन्हें राजा की चादर पर डाल दिया। उस दिन भिखारी को रोज से अधिक भीख मिली, मगर वे दो दाने देने का मलाल उसे सारे दिन रहा। शाम को जब उसने झोली पलटी तो उसके आश्चर्य की सीमा न रही। जो जौ वह ले गया था, उसके दो दाने सोने के हो गए थे। उसे समझ में आया कि यह दान की ही महिमा के कारण हुआ है। वह पछताया कि काश! उस समय राजा को और अधिक जौ दी होती, लेकिन नहीं दे सका, क्योंकि देने की आदत जो नहीं थी।