हमीं हैं, इस धरती की शान, हमीं हैं चिर गौरव अभिमान।
जग के झंझावातों का हम, करते सदा निदान।
आंधी, तूफानों में बनते, हम अभेद्य चट्टान।
सत्साहस, उत्साह हमारा, जैसे भूधर जान - हमी०
बढ़ते कदम न रुकते अपने, रखते प्रण का ध्यान।
चरण सफलता सदा चूमती, जो भारी श्रमवान।
कैसे सुरसरि महि पर आई, जाने हर इंसान - हमी०
मरू में मरू उद्यान बना दें, जल तैरें पाषान।
अम्बर को वसुधा पे ला दें, नर हो ईश समान।
हम अज्ञान तिमिर को हरके, लायें ज्ञान-विज्ञान - हमी०
नरक स्वर्ग में बदलूं पल में, श्रम का तान वितान।
नंगे पैरों प्रभु आयेंगे, अगर करे आह्वान।
सिन्धु अगाध उतर जाने को, बन जायें हनुमान - हमी०
दानवता का कर विनाश दें, मानवता-उत्थान।
पुष्प एकता के बिखरा दें, न हो द्वेष का मान।
अमृत का जलनिधि लहरायें, लायें वह विज्ञान - हमी०
साक्षरता का दीप जलायें, सब सर्वज्ञ सुजान।
सब समृद्ध, सुशील, सुखी हों, हो नव युग निर्मान।
विकसित देशों की गणना में, होवे हिन्दुस्तान - हमी०
काश्मीर से जहाँ कुमारी, सब जन एक समान।
असम काठियावाड़ तलक हो, विस्तृत समता खान।
भ्रातृ भाव सागर उफनाएं, हो सबका कल्याण - हमी०
- रामखेलावन वर्मा 'सरोज'
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