Wednesday, January 16, 2008

प्रयाणगीत

रही हिमालय की चोटी ललकार
चढ़ते आओ
करतीं सागर की लहरें मनुहार
बढ़ते जाओ
मरुस्थल के टीलों से उठी पुकार
मत घबराओ
हरे-भरे खेतों की मंद बयार
उपज बढाओ।
मानो नहीं मशीनों से तुम हार
उन्नति लाओ
कम्प्यूटर से खूब बढ़ाओ प्यार
सुविधा पाओ
जल-स्थल-नभ सब में होए संचार
चलते जाओ
पूजे भारत को सारा संसार
सुयश कमाओ।

- डॉ० रामप्रसाद मिश्र

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