आई जिस दिन बड़ी दिवाली।
बिल्ली बोली, "प्यारी चुहिया
मैं हूँ बूढ़ी, आ री चुहिया।
मत डर बिटिया भोली भाली,
सुन तो यह है बड़ी दिवाली।।
संग-संग अब हम खेलेंगे,
कुछ भी मिल जाये ले लेंगे।
दूध-दही भोजन की थाली,
मेरी ममता तू ने पा ली॥
चुहिया बोली, "डर लगता है,
तू खा लेगी, मन कहता है।
लगता है तू मन की काली,
चूहे राजा की है साली॥
बिल्ली झपटी, चुहिया भागी,
हाथ जोड़कर माफ़ी माँगी।
गिरी भूमि पर दूध की प्याली,
भूरी चुहिया, बिल्ली काली॥
- डॉ० महेशचन्द्र शुक्ल
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