मुझ को तो रोना आता है।
चाचा नेहरू के बिन भारत,
का कोना-कोना सूना है।
कैसे माँ मैं ख़ुशी मनाऊँ,
गीत सलोने सुगढ़ सुनाऊँ!
सजी हुई आरती पुकारे-
किस विधि अर्चन थाल सजाऊँ!!
बेटा, उठो, बढ़ो साहस कर,
प्राची दिशि है रही पुकार!
सजी आरती कर्तव्यों की,
रणभेरी का स्वर गुंजार!!
रोने से कुछ काम न होगा,
नेहरू रटकर नाम न होगा।
कर्तव्यों की यह वेला है-
ढलता सूरज धाम न होगा॥
नूतन! सुबह यहाँ फिर होगी
उषा-किरण सजेगी थाल!
अर्चन-वन्दन करने के हित
बेटा, बनो जवाहर लाल!!
- डॉ० महेश चन्द्र मिश्र 'विधु'
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