Wednesday, January 16, 2008

बनो जवाहर लाल

कल ही बाल दिवस है माँ जी,
मुझ को तो रोना आता है।
चाचा नेहरू के बिन भारत,
का कोना-कोना सूना है।

कैसे माँ मैं ख़ुशी मनाऊँ,
गीत सलोने सुगढ़ सुनाऊँ!
सजी हुई आरती पुकारे-
किस विधि अर्चन थाल सजाऊँ!!

बेटा, उठो, बढ़ो साहस कर,
प्राची दिशि है रही पुकार!
सजी आरती कर्तव्यों की,
रणभेरी का स्वर गुंजार!!

रोने से कुछ काम न होगा,
नेहरू रटकर नाम न होगा।
कर्तव्यों की यह वेला है-
ढलता सूरज धाम न होगा॥

नूतन! सुबह यहाँ फिर होगी
उषा-किरण सजेगी थाल!
अर्चन-वन्दन करने के हित
बेटा, बनो जवाहर लाल!!

- डॉ० महेश चन्द्र मिश्र 'विधु'

No comments:

Post a Comment